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आज फिर उठेगा कलम...........

Posted On: 27 Aug, 2012 कविता में

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आज  फिर उठेगा  कलम

करने  को  बयान  मन की

लगा  था  यूँ  की जैसे  अब  न  लिख  सकेंगे  कभी

दिशा  बदल  सी  गयी  है  अब  मेरे  जीवन  की

मगर  में  चाहती  हूँ  की  फिर  वहीँ  पहुँच  जाऊं

जहाँ  न  रवि  पहुँचते  हैं  न  ही  कवि

थोडा  कुछ  हट के  लिखूं  डट  के  लिखूं

पिरो  के  शब्दों  की  एक  अद्भुत  माला

जो  भूली  हुई  गलियां  थी  उनमे  फिर  से  फिरूं

नहीं  भाते  पहले  की  तरह  पहाड़  नदिया

ये  हवा  ये  फिजा  और  ये  सावन  की  घटा

कभी  लगता  है  जैसे  बीत  गया  वो  मौसम  ख़ुशी  का

इस  उदासी  भरी  भारी  ज़िन्दगी  में

कुछ  हलके  लम्हों  की  तरह  हो   ये  मेरी  कविता

मुझे  अग्रसर  करे  लिखने  को  कुछ  उम्दा  उम्दा

इस  कोशिश  में  पाठकों   से  है बस  एक  कामना

पढ़े  पहली  इ -कविता  देके  शुभकामना

सधन्यवाद ………….



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5 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

akdubey के द्वारा
August 28, 2012

welcome to the platform…… it is such a nice 1…..peoples rarely found such type of poem to read…..congrats nd keep updating…..

    surabhi के द्वारा
    August 28, 2012

    Thank u so much for Encouragement.

vikramjitsingh के द्वारा
August 28, 2012

सुरभि जी…… आपका स्वागत है…… और पढ़ भी ली आपकी कविता……अच्छी है…..बढ़िया है….. उम्मीद है…आगे भी बढ़िया रचनाओं से इस मंच को अलंकृत करती रहेंगी……

    surabhi के द्वारा
    August 28, 2012

    जी अवश्य विक्रमजी …आपने पढ़ा और सराहा …नया हौसला दिया इसके लिए बहुत बहुत धन्यवाद!

dineshaastik के द्वारा
August 28, 2012

सुरभी जी, मंच पर आपका स्वागत है। बहुत ही सुन्दर काव्यात्मक भावाभिव्यक्ति……


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